मऊ। जनपद मऊ की सबसे हॉट सीट माने जाने वाली मधुबन विधानसभा में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी पारा चढ़ने लगा है। भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व राज्यमंत्री उत्पल राय के समाजवादी पार्टी में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सपा हाईकमान से उनकी बातचीत अंतिम दौर में है और यदि समाजवादी पार्टी उन्हें मधुबन से अपना प्रत्याशी बनाती है तो मधुबन का पूरा राजनीतिक समीकरण बदल सकता है।उत्पल राय मधुबन क्षेत्र के एक ऐसे नेता हैं जिनका जनाधार सभी जातियों और वर्गों में माना जाता है। छात्र राजनीति से लेकर राज्यमंत्री तक का उनका सफर काफी संघर्षपूर्ण और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। उनकी संभावित घर वापसी को सपा के लिए मधुबन में एक बड़े गेमचेंजर के रूप में देखा जा रहा है।
बीते कुछ दिनों से उत्पल राय लगातार समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के संपर्क में हैं। लखनऊ से लेकर मऊ तक उनके समर्थकों में यह चर्चा जोरों पर है कि वे जल्द ही भाजपा छोड़कर फिर से साइकिल की सवारी कर सकते हैं। भाजपा में पिछले कुछ समय से खुद को उपेक्षित महसूस करने और मधुबन में संगठनात्मक बदलाव के चलते उन्होंने यह मन बनाया है। हालांकि अभी तक उन्होंने आधिकारिक रूप से कोई घोषणा नहीं की है, लेकिन उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि फैसला लगभग तय है।
यदि सपा उन्हें मधुबन से टिकट देती है तो मुकाबला बेहद दिलचस्प हो जाएगा। मधुबन में भाजपा, सपा और बसपा के बीच हमेशा त्रिकोणीय लड़ाई रही है। उत्पल राय जैसे जमीनी नेता के आने से सपा को सवर्ण, पिछड़ा और युवाओं का बड़ा वोट बैंक एक साथ मिलने की उम्मीद है।
0 जानिए उत्पल राय का राजनीतिक सफरनामा, छात्रसंघ से राज्यमंत्री तक…
0 छात्र राजनीति से शुरुआत..
उत्पल राय की राजनीति की पाठशाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय रही है, जिसे राजनीति की नर्सरी कहा जाता है। वर्ष 1994 में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के उपाध्यक्ष रहे। यहीं से उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल, भाषण कला और नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया।
0 समाजवादी पार्टी में राष्ट्रीय पहचान…
छात्र राजनीति के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थामा। अपनी मेहनत और संगठन क्षमता के दम पर वर्ष 1997 में उन्हें समाजवादी युवजन सभा का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। उस दौर में उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में युवाओं को सपा से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।
0 1800 वोट से हारे थे चुनाव…
वर्ष 2002 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें जनपद मऊ की मधुबन विधानसभा से अपना प्रत्याशी बनाया। पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ते हुए उन्होंने कड़ी टक्कर दी, लेकिन मात्र 1800 वोटों से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इतने कम अंतर से हारने के बाद भी उन्होंने क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी।
0 राज्यमंत्री का दर्जा…
2007 में उन्हें उत्तर प्रदेश ग्रामीण आवास विकास परिषद का चेयरमैन बनाया गया, जिसका दर्जा राज्यमंत्री का था। इस पद पर रहते हुए उन्होंने ग्रामीण आवास योजनाओं को गति देने का काम किया।
0 कांग्रेस से भी आजमा चुके हैं किस्मत…
वर्ष 2012 में जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी से मधुबन विधानसभा का चुनाव लड़ा और 26,000 मत प्राप्त कर तीसरे स्थान पर रहे। उस चुनाव में मोदी लहर नहीं थी और कांग्रेस का संगठन कमजोर होने के बावजूद इतने वोट लाना उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता को दर्शाता है।
0 संगठन के सिपाही…
संगठन के निर्देश पर उन्होंने बिहार चुनाव में बेगूसराय जिले में पार्टी के लिए काम किया और वहां संगठन को मजबूत किया। 9 जुलाई 2016 में भाजपा के एक नेता के आग्रह पर भाजपा में आने के बाद लगातार पार्टी और संगठन में सक्रिय रहे।
0 मधुबन का समीकरण क्यों बदलेगा …
मधुबन विधानसभा हमेशा से चौहान,यादव,ब्राम्हण, दलित और मुस्लिम बहुल सीट रही है। उत्पल राय की छवि एक ऐसे नेता की है जो सभी वर्गों में स्वीकार्य है। सपा के पास पहले से ही मुस्लिम-यादव समीकरण है, अगर उसमें उत्पल राय का सवर्ण और पिछड़ा वोट बैंक जुड़ जाता है तो भाजपा के लिए यह सीट बचाना मुश्किल हो जाएगा।
फिलहाल मधुबन की जनता और कार्यकर्ता उनकी आधिकारिक घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। अगर यह अटकलें सच साबित हुईं तो मधुबन का चुनाव इस बार पूरे प्रदेश में सबसे चर्चित चुनावों में से एक होगा।
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- प्रधान सम्पादक
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